Print ISSN: 2581-7884 | ISSN-L: 2581-7884 | Volume III | Issue 36 | July–September 2026
Abstract
This research paper provides an overview of the historical, administrative, and archaeological significance of the 'Rampurva' site, situated near the India-Nepal border in the West Champaran district of Bihar. The foundation of archaeological surveys in India was laid through the efforts of Francis Buchanan, Sir Alexander Cunningham, A.C.L. Carlyle, and Daya Ram Sahni. At Rampurva, two famous monolithic pillars erected by Emperor Ashoka were discovered—the first featuring a Lion Capital (inscribed) and the second featuring a Bull Capital (uninscribed). Excavations also yielded a barrel-shaped copper bolt (engraved with 'Taurine' and 'Chaitya' motifs) and an ancient polished broken Shivling from a mound. Currently, the Lion Capital and the copper bolt are preserved in the Indian Museum in Kolkata, while the exquisite Bull Capital is housed at the Rashtrapati Bhavan (Presidential Residence). Located on the ancient highway connecting Pataliputra to Nepal, Emperor Ashoka selected the dense forests of Champaran to erect these pillars to strengthen administrative control, propagate Dhamma, and foster public awareness.
सारांश
यह शोध-पत्र बिहार के पश्चिमी चम्पारण जिले में स्थित भारत-नेपाल सीमा के समीप 'रमपुरवा' पुरास्थल के पुरातात्विक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व का अवलोकन प्रस्तुत करता है। पुरातात्विक सर्वेक्षण की दिशा में डॉ. फ्रांसिस बुकानन, सर एलेक्जेण्डर कनिंघम, ए.सी.एल. कार्लाइल और दयाराम साहनी के योगदानों को रेखांकित किया गया है। रमपुरवा से सम्राट अशोक द्वारा स्थापित दो प्रसिद्ध एकाश्मिक स्तंभ मिले हैं—एक सिंह शीर्ष युक्त (अभिलेखसहित) और दूसरा वृषभ (बैल) शीर्ष युक्त (अभिलेखरहित)। इसके अतिरिक्त, ताँबे का बैरल आकार का बोल्ट (जिस पर टौरीन एवं चैत्य की आकृतियाँ हैं) तथा उत्खनन से प्राप्त शिवलिंग एवं बौद्ध विहारों के साक्ष्य इस स्थल की ऐतिहासिक समृद्धि को दर्शाते हैं। शोध-पत्र में चम्पारण के बीहड़ जंगलों में सम्राट अशोक द्वारा तीन स्तंभ स्थापित करने के प्रशासनिक एवं धार्मिक कारणों का भी विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है।
1. प्रस्तावना (Introduction)
बिहार में पुरातात्त्विक अध्ययन प्रारम्भ करने का श्रेय डाॅ0 फ्रांसिस बुकानन को जाता है। यद्यपि उनकी नियुक्ति 1800 ई0 में मैसूर क्षेत्र के कृषि सम्बन्धी सर्वेक्षण के लिए की गई थी। उन्होंने कृषि सम्बन्धी विवरणों के साथ-साथ पुरावशेषों के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचनाएं प्रस्तुत की। 1807 ई0 में उन्हें बंगाल प्रेसिडेन्सी के सांख्यिकी सर्वेक्षण का कार्य-भार सौंपा गया और उन्हें निर्देश दिया गया कि इस सर्वेक्षण में भू-संरचना, इतिहास एवं पुरा सम्पदाओं से सम्बन्धित सामग्री को भी समाहित करे। डा. बुकानन ने सात वर्षों में बिहार, शाहाबाद, भागलपुर, गोरखपुर, दीनाजपुर, पूर्णिया और रंगपुर का व्यापक सर्वेक्षण किया। उनके द्वारा सर्वेक्षित प्रान्तों की शृंखला में पश्चिमी चम्पारण परिक्षेत्र एक था तथा यह उस समय बिहार प्रदेश के चम्पारण जनपद के अन्तर्गत था।1
2. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग एवं कनिंघम
डॉ. बुकानन के पश्चात् कई दशकों तक भारतवर्ष में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण एवं अध्ययन की दिशा में शासकीय स्तर पर कोई व्यवस्थित प्रयत्न नहीं हुआ। यद्यपि कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आंशिक रूप से अध्ययन होते रहे। सन् 1861 ई. का वर्ष भारतीय पुरातत्त्व के इतिहास का एक महत्वपूर्ण वर्ष था, क्योंकि इस वर्ष शासकीय स्तर पर इस देश की पुरानिधियों एवं पुरावशेषों की ओर ध्यान देने के लिए भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना हुई थी। यह भारत में पुरातत्त्व सम्बन्धी अनुसंधान का शासकीय स्तर पर प्रथम प्रयास था। सन् 1861 ई. में एलेक्जेण्डर कनिंघम को महत्वपूर्ण स्मारकों की रूपरेखा, रेखाचित्रों, छायाचित्रों, उनके इतिहास एवं परम्परा के निरूपण तथा संकलन हेतु इस कार्य को सम्पन्न करने का दायित्व सौंपा गया। कनिंघम को पुरातात्त्विक सर्वेयर नियुक्त किया गया, जिसने सन् 1861 ई. से लेकर 1865 ई. के मध्य पूर्व में गया जिले से लेकर पश्चिम में सिन्धु तक तथा उत्तर में कालसी (देहरादून) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मध्यवर्ती क्षेत्रों के प्राचीन स्थलों की यात्रा एवं स्मारकों का सर्वेक्षण किया और ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की विस्तृत आख्याएँ भी तैयार की।
मूलतः भारत में पुरातात्त्विक अध्ययन का व्यवस्थित क्रम सर एलेक्जेण्डर कनिंघम से ही प्रारंभ होता है। कनिंघम ने पुरातत्त्व की प्रांसगिकता एवं उपादेयता को इतिहास के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने घने जंगलों, बीहड़ मार्गों और असहनीय कठिनाइयों को सहकर फाह्मान एवं ह्नेनसांग के यात्रा विवरण को आधार बनाकर सम्पूर्ण भारत की यात्रा की तथा उन स्थलों को प्रकाश में लाया जिनके विषय में जानकारी नहीं थी। कनिंघम के सर्वेक्षण का मुख्य प्रयोजन प्राचीन स्थलों, स्मारकों एवं पुरावशेषों को प्रकाश में लाना था।
पश्चिमी चम्पारण जनपद के अन्तर्गत छिपे पुरावशेषों एवं पुरास्थलों को प्रकाश में लाने का व्यवस्थित कार्य कनिंघम द्वारा सन् 1861-62 ई. में प्रारंभ किया गया। कनिंघम ने 1861 ई. में इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया। उनके इस सर्वेक्षण योजना के मूलतः दो प्रयोजन थे। प्रथम इस क्षेत्र के पुरावशेषों तथा पुरास्थलों का सर्वेक्षण एवं संग्रह तथा द्वितीय बौद्ध धर्म से सम्बंधित स्थलों की पहचान, जो वर्तमान समय में उजाड़ हो गये थे। इस योजना को साकार करने के लिए उन्होंने सम्पूर्ण चम्पारण जनपद का परिभ्रमण किया। इस सर्वेक्षण के क्रम में अनेक उपेक्षित एवं अज्ञात पुरास्थल प्रकाश में आये जिसका विवरण कनिंघम की भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण नाम से 23 जिल्दों वाली विशाल रिपोर्ट में प्रकाशित है।2
3. रमपुरवा पुरास्थल: भौगोलिक स्थिति एवं खोज का इतिहास
(रमपुरवा: 27°16’11.71’’ उत्तरी अक्षांश एवं 84°29’58.14’’ पूर्वी देशान्तर)
यह पुरास्थल गौनाहा रेलवे स्टेशन के निकट उसके पश्चिमोत्तर दिशा में अवस्थित है। यह स्थल भारत-नेपाल सीमा के बिल्कुल समीप है तथा पाटलीपुत्र-लौरिया-नेपाल जाने के प्राचीन राजमार्ग पर अवस्थित है। यहाँ सम्राट अशोक द्वारा एकाश्मिक स्तंभ स्थापित करवाया गया था जिस पर उसका धम्म अभिलेख उत्कीर्ण है। सर्वप्रथम कनिंघम के सहयोगी कार्लाइल ने वर्ष 1877-78 में इस स्थल का पुरातात्त्विक प्रतिवेदन प्रकाशित किया।2 तत्पश्चात् इसी प्रतिवेदन को आधार बनाकर कनिंघम ने सन् 1880-81 ई0 में रमपुरवा का सर्वेक्षण किया तथा कई टीलों का सीमित उत्खनन भी कराया जिससे अनेक पुरातात्त्विक महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में आये। सन् 1907-08 ई0 में दयाराम साहनी ने इस पुरास्थल का विस्तृत उत्खनन कराया।3
4. पुरातात्विक उत्खनन एवं एकाश्मिक स्तंभों का विवरण
4.1 प्रथम एकाश्मिक स्तंभ (सिंह शीर्ष) एवं ताँबे का बोल्ट
कार्लाइल ने वर्ष 1877-78 ई. में रमपुरवा से लगभग दो किलोमीटर पश्चिम दिशा में सर्वप्रथम दो एकाश्मिक स्तंभों की खोज की तथा इन स्तंभों के चारों ओर उत्खनन कार्य किया। यहाँ से कनिंघम को ताँबे का बना हुआ बैरल आकार का बोल्ट प्राप्त हुआ था, जो 62 सें. मी. लम्बा है और व्यास 14 सें. मी. तथा 9 सें. मी. का है।4 यह वर्तमान में कलकत्ता के इण्डियन म्यूजियम में रखा है। इस ताँबे के तार का विशेष अध्ययन दयाराम साहनी ने सन् 1907 ई. में किया तथा पाया कि इस पर "टौरीन" तथा तीन "चैत्यों" की आकृति अंकित थी।
साहनी ने जब इस पुरास्थल के एकाश्मिक स्तंभ वाले हिस्से का सोलह फीट नीचे तक उत्खनन किया तब पाया कि यह सात फीट नौ इंच चौकोर तथा एक फीट नौ इंच मोटे पत्थर पर यह स्तंभ खड़ा है। स्तंभ के ऊपर का शीर्ष ढाई फीट ऊँचा है जबकि पूरे स्तंभ की कुल लम्बाई चौवालिस फीट साढ़े दस इंच मापी गई। ऊपरी भाग से इसकी गोलाई तीन फीट है।4 लौरिया नन्दगढ़ के समान सिंह की आकृति रमपुरवा के एकाश्मिक स्तंभ पर भी रखा गया था। साहनी ने इस शीर्ष की माप सात फीट बताया है तथा वर्तमान में यह इंडियन म्यूजियम में है।5
4.2 द्वितीय एकाश्मिक स्तंभ (वृषभ शीर्ष)
रमपुरवा में अशोक द्वारा स्थापित किया गया एक अन्य एकाश्मिक स्तंभ भी है जिसे कार्लाइल ने सन् 1877 ई. में खोजा था। तब यह स्तंभ भूमि सतह से छः फीट ऊपर दिखाई देता था। कनिंघम ने जब इसका उत्खनन प्रारंभ किया और जब पाँच फीट की गहराई तक ही खुदाई कर पाये थे तभी भूमितल में तेज पानी का रिसाव होने लगा। बाद में जब 1907-08 ई0 में दयाराम साहनी ने इस स्थल के समीप उत्खनन कार्य प्रारंभ कराया तब उन्हें एक शीर्ष भाग मिला। उन्होंने इस स्तंभ की कुल माप तैतालिस फीट चार इंच लम्बा बताया। इसके जड़ भाग की गोलाई तीन फीट आठ इंच तथा शीर्ष भाग की गोलाई दो फीट एक इंच है। इस स्तंभ पर चार फीट ऊँचा वृषभ (बैल/साड़) की अति मनमोहक आकृति ‘एबेकस’ बैठाई गई थी। इस एकाश्मिक स्तंभ पर कोई अभिलेख उत्कीर्ण नहीं है।6 वर्तमान समय में यह वृषभ शीर्ष राष्ट्रपति भवन में रखा गया है।
4.3 टीलों से प्राप्त अन्य पुरावशेष (शिवलिंग)
कार्लाइल ने रमपुरवा में दो टीलों का उल्लेख किया है जिसका उत्खनन सन् 1880-81 में कनिंघम के द्वारा कराया गया। इनमें से एक की ऊँचाई बीस फीट थी जिसका पुरातात्त्विक उत्खनन कनिंघम ने वर्ष 1880-81 में करवाया।7 लगभग छः फीट की गहराई पर एक टूटा हुआ शिवलिंग प्राप्त हुआ। यह शिवलिंग दो फीट दो इंच ऊँचा तथा इसकी गोलाई छः इंच मापी गयी थी। इस पर काफी चमक है। इस शिवलिंग के औचित्य एवं ऐतिहासिकता पर कनिंघम महोदय ने कोई प्रकाश नहीं डाला है।
5. ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक महत्त्व
सम्राट अशोक ने धम्म प्रसार के अभियान को तीव्र गति प्रदान करने हेतु छः स्थानों पर क्रमशः:
- दिल्ली - टोपरा
- दिल्ली - मेरठ स्तंभ
- इलाहाबाद - कौशाम्बी स्तंभ
शेष तीन स्तंभ चम्पारण जनपद के लौरिया - नन्दनगढ़, लौरिया - अरेराज व रमपुरवा में स्थापित कराया है।
अब प्रश्न यह उठता है कि सम्राट अशोक को, चम्पारण जनपद जो कि सघन वनों से आच्छादित था, में एक साथ तीन स्तंभ लेखों को स्थापित कराने का क्या प्रयोजन रहा होगा? अगर इन्हें देश के विभिन्न प्रमुख राजमार्गों पर लगाने का प्रयोजन था, तो अन्य स्थानों पर अभिलेखयुक्त एकाश्मिक स्तंभ क्यों नहीं मिलें हैं?
चम्पारण जनपद से प्राप्त तीनों स्तंभों में से दो तो गंडक नदी के लगभग किनारे पर स्थापित हैं तथा एक भारत - नेपाल सीमा पर। इसके समीप ही भिखनाठोरी नामक स्थल है जो बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस मार्ग पर वैशाली से केसरिया होते हुए बुद्ध, उनके शिष्यगण एवं बौद्ध पर्यटक भारत से नेपाल जाते-आते रहे होंगे। इसके साथ ही यह भी सम्भावना व्यक्त की जा सकती है कि इस क्षेत्र के जंगलों में अशोक के समय में भी अराजकता व्याप्त रही होगी। पशु-पक्षियों, जानवरों का आखेट भी किया जाता रहा होगा, सामाजिक व्यवस्था टूटने के कगार पर रही होगी तथा लोग धर्म से विमुख होने लगे होंगे। इसी कारणवश प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ कर जनचेतना जागृत करने के उद्देश्य से सम्राट अशोक ने चम्पारण के इन बीहड़ जंगलों का चयन एकाश्मिक स्तम्भ स्थापित कराने हेतु किया होगा।
6. संदर्भ
- Ghosh, A.: Indian Archaeology, pp. 1-2
- Cunningham, Alexander (2000): ASI Report, Vol. XVI, pp. 110-17
- Sahni, Daya Ram: ASI Annual Report (1906-07), p. 16
- Ibid, p. 16
- Cunningham, Alexander: op. cit., Vol. XVI, pp. 110-17
- Sahni, Daya Ram: op. cit., p. 16
- Cunningham, Alexander: op. cit., Vol. XVI, pp. 110-17
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